माता कौशल्या — राजधर्म, क्षमा और मर्यादा की अदृश्य धुरी माता कौशल्या — अखंड क्षमा, राजधर्म की पराकाष्ठा और अयोध्या की महा-स्थिरता ━━━━━━━━━━━━━━━ ॥ श्री गणेशाय नमः ॥ ━━━━━━━━━━━━━━━ ✍️ एक लेखक और चिंतक के रूप में मेरे विचार… क्या माता कौशल्या केवल पुत्र-वियोग में तड़पने वाली एक माँ थीं… या संकट के समय रघुकुल को गृह-युद्ध से बचाने वाली सबसे गंभीर, धैर्यवान और स्थिर शक्ति? ━━━━━━━━━━━━━━━ अयोध्या का संकटकाल अयोध्या का वह राजभवन… जहाँ महाराज दशरथ के प्रांत्यागने के बाद शोक, भय और अराजकता का अंधकार छा चुका था। श्रीराम वन में थे… भरत और शत्रुघ्न ननिहाल में थे… राजसिंहासन रिक्त था… और पूरा रघुकुल भीतर से टूटने की कगार पर खड़ा था। लेकिन उस भयानक संकट के बीच… राजमहल में एक ऐसी राजमाता विराजमान थीं, जिनके हिस्से में इतिहास का सबसे क्रूर पुत्र-वियोग आया था—फिर भी जिनके मुख से कैकेयी के लिए एक भी अपशब्द नहीं निकला। वह थीं— महारानी कौशल्या । एक ऐसी महा-नायिका… जो केवल महाराज दशरथ की पटरानी नहीं थीं, बल्कि रघुकुल की आंतरिक स्थिरता, क्षमा और राजधर्म की सबसे बड़ी धुरी थीं। ━━━━━━━━━━━━━━━...
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